Saturday, March 25, 2023
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पत्थर, लाठी, पॉवर!

हरिशंकर व्यास
पत्थर, मनुष्य का वह पहला हथियार था, जिससे वह पशु जगत का स्वामी बना। ज्पत्थर ने मनुष्य की भूख बढ़ाई। आधुनिक वक्त में भी मनुष्य वंशज ‘पॉवर’ (पत्थर, लाठी) की भूख में मरे जा रहे हैं। हर मनुष्य लाठी और पॉवर का आकांक्षी है, भूखा है।ज्कई मायनों में पत्थर और उसकी ताकत मानव सभ्यता के निर्माण और विकास का आदि व अंत दोनों है। पत्थर के बाद तीर-कमान, भाले, लाठी, तलवार, तोप, मिसाइल का विकासवाद यदि मनुष्य खोपड़ी के दिमाग की उड़ान है तो वैसा होना जहां मनुष्य डीएनए के हिंसक रनवे से उड़ान का टेकऑफ है वहीं घूम-फिर कर डिपार्चर रनवे (पशुगत डीएनए) पर ही बार-बार लौट आना भी है।

प्रलय का मुहाना -24:  पत्थर मतलब मनुष्य का पहला औजार! पहला मनुष्य हथियार। वह पत्थर अब पॉवर है! पाषाण युग में मनुष्य ने पत्थर से जंगल में विजय पाई थी। उससे जानवर डरने-मरने लगे। अब आधुनिक युग है और मनुष्य ‘पॉवर’ से मनुष्यों को डराता और मारता है। मनुष्यों को पिंजरों का पालतू बनाता है। सवाल है मनुष्य पत्थर पाकर हिंसक हुआ या खोपड़ी के हिंसक डीएनए की जरूरत ने पत्थर खोजा? इसका जवाब दो टूक है। शरीर की जैविक रचना में हिंसा मनुष्य का स्वभाव है। इंसान का शरीर हिंसा अनुकूल है! उसके हाथ की मु_ी भी ऐसी है कि उस जैसे मुक्के मारना किसी और जानवर के बस की बात नहीं है। वैज्ञानिकों की मानें तो आदमी का चेहरा मुक्केबाजी के लिए है। ऐसे ही मनुष्य के खड़े होने की पोजिशन उसके लड़ाका शरीर का प्रमाण है। मतलब पुरूष का शरीर हिंसा और आक्रामकता की डिजाइन में है। तभी थ्योरी है कि मनुष्य जैविक रूप से हिंसा की मशीन है। हिंसा के लिए ही मानव जाति विकसित है। विचारक थॉमस हॉब्स का 17वीं शताब्दी में निष्कर्ष था कि मनुष्य प्रारंभिक प्राकृतिक स्थिति में ‘बुरा, क्रूर और टुच्चा’ प्राणी था। हिंसा ने मनुष्य प्रजातियों को ढाला है। उनके शरीर और दिमाग को उकेरा है।

जो हो, पत्थर मनुष्य हिंसा का, ‘सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की परीक्षा का पहला साधन था। जंगल में भय, भूख को दूर करने की उसकी पहली खोज थी। उस नाते मानव सभ्यता के मनोविश्व की यह स्थिति स्थायी और सनातनी है कि मनुष्य तब भी भूखा था अब भी भूखा है। वह तब भी भय में जीता था और अब भी भय में जीता है। वह तब भी नरभक्षी था और अब भी है! तब कम अनुपात में मनुष्य एक-दूसरे को मारते थे अब थोक, जनसंहार, महायुद्धों में एक-दूसरे को मारते हैं! तब और अब में आकार-प्रकार और अनुपात में फर्क है लेकिन जो भी है वह होमो सेपियन के ढाई लाख सालों से चले आ रहे जीवसूत्रों (डीएनए) की निरंतरता में है।

आदि और अंत
पत्थर, मनु्ष्य का वह पहला हथियार था जिससे वह पशु जगत का स्वामी बना। जीव जगत में तब वह खास हुआ। उसमें पॉवर का अहम बनना शुरू हुआ। वह अपने को श्रेष्ठ समझने लगा। तब के वनमानुष पत्थर की ताकत पा कर और हिंसक हुए। वे पत्थर की ताकत से ‘सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की परीक्षा देने लगे। जिसके पास अधिक पत्थर और जो पत्थर उपयोग में अधिक माहिर वह विजेता। जो जीता उसके स्वामित्व में फिर पराजित बाड़े के लोग, औरतें-बच्चे! धीरे-धीरे तेरे-मेरे, मैं मालिक, मैं मुखिया और अहम के आइडिया की विभिन्नताएं पत्थर की ताकत से बनती हुईं!
कई मायनों में पत्थर और उसकी ताकत मानव सभ्यता के निर्माण और विकास का आदि व अंत दोनों है। पत्थर के बाद तीर-कमान, भाले, लाठी, तलवार, तोप, मिसाइल का विकासवाद यदि खोपड़ी के दिमाग की उड़ान है तो वैसा होना जहां मनुष्य डीएनए के हिंसक रनवे से उड़ान का टेकऑफ है वहीं घूम-फिर कर डिपार्चर रनवे (पशुगत डीएनए) पर ही उसका बार-बार लौट आना भी है।

तभी ताकत ने मनुष्य का अहंकार लगातार बढ़ाया। विवेक के बावजूद अवचेतन में अविवेक एक्टिव रहा। मनुष्य दूसरे मनुष्य को मार कर, दुखी करके, उसे गुलाम या भक्त बना कर खुश होता है। विजय का जश्न मनाता है। अपना स्वामित्व बढ़ाता है। वह अपने को और पॉवरफुल बनाता है। पत्थर ने भूख बढ़ाई और उसका वंशज पॉवर भी आधुनिक काल में भूख बढ़ाते हुए हैं। हर मनुष्य ताकत और पॉवर का आकांक्षी है, भूखा है। अमेरिका पॉवर से पॉवरफुल है तो अमीर धन से पॉवरफुल! ऐसे ही सभ्यता, देश, शासक सब पॉवर के टॉनिक से पॉवरफुल बने हुए होने के अहम में जीते हैं!
और यह सब उस सिलसिले की निरंतरता से है, जिसमें पत्थर के पाषाण हथियार, तीर-धनुष, भाला, गदा, लाठी और तलवार, मिसाइल क्रमश: शक्ति के बदलते हुए रूप हैं। इन्हीं को हाथ में लिए फिर लोगों की, समाज की भीड़ का सेनाओं में बदलने का विकास हुआ!

सब किसलिए? भूख, भय और जीव जगत (बाद में मानव जगत में व्यक्ति, संस्कृति की श्रेष्ठता का ख्याल) में अलग और खास होने के अहंकार में! हां, पाषाण युग से लेकर इक्कीसवीं सदी का आधुनिक युग कुल मिलाकर भूख, भय और अहम तीनों के सुरसा की तरह बढ़ते जाने का अनुभव है। कई विचारकों का इस आधार पर पॉजिटिव भाव में मानना है कि इसी के कारण विकास हुआ। ताकत के हर औजार, प्रयोग से मानव समाज ज्ञान-विज्ञान-तकनीक खोजता गया!

अमनपरस्त या हिंसक?
बहरहाल, आठ अरब लोगों और 195 देशों की मौजूदा रियलिटी का रेखांकित सत्य है कि सब पत्थर-लाठी-पॉवर की उस चकरी पर घूमते हुए हैं, जो बिना मंजिल के है। मनुष्य ने पत्थर, तीर-कमान से पशु जगत को जीता। वह ताकत से पशुपालक हुआ। खेती करना सीखा। अपने-अपने बाड़े बनाए। संस्कृतियां बनाईं। धर्म-संस्कृति-राष्ट्र बनाए। बावजूद इस सबके उसे तलवार और तोप की निरंतर जरूरत बनी रही! क्यों?

हिंसक शरीर और दिमाग के कारण! अब ऐसा सभी विज्ञानियों और देवर्षियों का नहीं मानना है। आधुनिक दुनिया के वैश्विक विचारक, अनुभवों के सत्य के बावजूद मानते हैं कि मानव समाज शांति से रह सकता है। जैविक डीएनए की निराशावादी रियलिटी से परे मानवता सभ्य और शांतिपूर्ण भविष्य बना सकती है। 1986 में न्यूरोफिजियोलॉजिस्ट डेविड एडम्स की पहल पर जीव विज्ञानियों, मनोवैज्ञानिकों और न्यूरोसाइंटिस्टों के बीस ज्ञानियों ने मनुष्य हिंसा पर ‘सेविले स्टेटमेंट’ से घोषणा की थी कि मनुष्य आनुवंशिक रूप से स्वभाव में युद्ध, या हिंसक क्रमादेशित नहीं है। इस बयान को बाद में यूनेस्को ने अपना कर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांति को बढ़ावा देने के मिशन में ऐलान किया था कि शांति एक यथार्थवादी लक्ष्य है।
सोचें, उसके बाद के पिछले चालीस सालों के अनुभवों पर। लड़ाई, हिंसा, स्वामित्ववादी राजनीति, हमले और नरसंहार की मनुष्य प्रवृत्तियां बढ़ी हैं या घटी हैं?
इसलिए पत्थर और पॉवर की मनोवृत्ति और भूख अनंत है, तो हिंसा भी स्थायी। 1968 में मानवशास्त्री नेपोलियन चागनन ने वेनेजुएला और ब्राजील के यानोमामी लोगों के स्वभाव का अध्ययन कर उन्हें जन्मजात ऐसे भयंकर लोग’ करार दिया जो हमेशा पंगे, लडऩे की अवस्था में रहते हैं।

मनोवैज्ञानिक स्टीवन पिंकर ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द ब्लैंक स्लेट’ में लिखा है कि जब हम मानव शरीर और दिमाग को देखते हैं, तो हमें उनके आक्रामकता के लिए डिजाइन हुए होने के अधिक प्रत्यक्ष संकेत मिलते हैं। खास तौर पर पुरूषों में परस्पर हिंसा की प्रतिस्पर्धा के इवोल्यूशनरी इतिहास के संकेत। पिंकर की मानें तो जो मनुष्य बिना स्टेट व्यवस्था के समाज में रहे हैं उनके पुरातात्विक साक्ष्यों का निष्कर्ष है कि उन्होंने आपसी लड़ाइयों से 15 प्रतिशत आबादी को खोया।
तभी क्या यह साबित नहीं होता कि मनुष्य कबीलाई जीवन, राज्यविहीन समाज या राज्य व्यवस्था की किसी भी अवस्था में जीता हो वह कम-अधिक अनुपात में हिंसक डीएनए लिए हुए है? वह संस्कृति के व्यवहार याकि सांस्कृतिक विश्वास के रूप में हिंसक भले न हो लेकिन जैविक रचना में अंतरनिहित पूर्वनिर्धारण से हिंसक होगा ही।
इस बहस का एक पहलू यह भी है कि मनुष्य की आसुरी हिंसा चार-छह हजार साल पहले शुरू हुए संस्कृतिगत विकास से घटने के बजाय प्रबल होती गई है। उसी के बाद युद्ध-महायुद्धों-संग्रामों का रैला बना। मतलब ज्यों-ज्यों मनुष्य संस्कृतियों का विकास हुआ त्यों-त्यों मनुष्यों की हिंसा बढ़ी।

आदिम और वर्तमान का फर्क
बायोमेकैनिस्ट डेविड कैरियर ने 70 से अधिक मनुष्य समूहों के प्रमाण इकठ्ठे किए हैं। इस दस्तावेजीकरण से कुछ समाजों के हिंसा से दूर रहने के प्रमाण मिले हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के मार्टू समाज में युद्ध व झगड़े के लिए शब्द नहीं है। मलेशिया के सेमाई समाज में संघर्ष की ज्योंहि नौबत आती थी तो लोग जंगल में भाग जाते। इनका तर्क है कि सुदूर अतीत में मनुष्य के समूह संघर्षों के बहुत कम पुरातात्विक सबूत हैं। जाहिर है युद्ध और लड़ाइयों का आम होना, मनुष्यों का उत्तरोत्तर आक्रामक और लड़ाका होना लगभग 12 हजार साल पहले बड़ी, गतिहीन सभ्यताओं के उभरने के बाद का परिणाम है। उनमें समाज विकास से है। यह बात पिंकर के निष्कर्षों के विपरीत है। पिंकर की मानें तो हिंसा मनुष्य स्वभाव में अंतरनिहित है। यह सच है कि ‘हिंसा, हिंसा को जन्म देती है’ एक समाज जो हिंसा को अपनाता है और उसके अनुकूल है, वह इसे पुन: पेश करता है, ऐसा करने के लिए वह संसाधनों का पता लगाता है और उसका लाभ उठाता है। हिंसा, मानवता में, मानवता से ही पैदा हुई है। प्रारंभिक होमो सेपियन से ले कर अब तक ताकत, लड़ाई, युद्ध, झगड़ों के किसी ने किसी रूप में हिंसा, मनुष्य व्यवहार का हिस्सा रही है।

इसलिए ‘पत्थर’ और ‘पॉवर’ का रूतबा स्थायी है। तय करना मुश्किल है कि पशुपालन करते-करते मनुष्य में मनुष्यपालन, याकि उन्हें गुलाम-दास बनाने की व्यवस्था के आइडिया कैसे आए?  क्या संस्कृति, विकास फर्क के कारण? तब जाहिर है विकास से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ी। दरअसल शक्ति, ताकत, पॉवर के आइडिया, कॉन्सेप्ट से, जहां औजारों (हथियारों) से मनुष्य की भूख बढ़ी वहीं भय और असुरक्षा का अनुभव भी बढ़ता गया। इसलिए जहां शक्ति और पॉवर की धुन बढ़ती गई तो वहीं दिमाग लड़ाई और हिंसा में लगातार पकता गया। बावजूद इसके यह पहेली अपनी जगह है कि मानव समाज के सभी पुराणों, धर्मंग्रंथों, धर्म-संस्कृतियों और ज्ञात इतिहास के मेसोपोटामिया, मिस्र, सभ्यताओं के ‘फर्टाइल क्रिसेंट’ जैसे पालने से लेकर ग्रीक, रोम, चाइनीज साम्राज्यों में यूनिवर्सली एक साथ यह साझा बीज कैसे डेवलप हुआ, जो सारा विचार मंथन ताकत और पॉवर की धुरी पर होने लगा। होमो सेपियन की कल्पनाओं में भी सृष्टि के जनक पॉवरफुल भगवानजी पैदा हुए तो व्यवस्था, शासन, और राजा भी पत्थरों के महल और पॉवर के अवतारी!
तब क्यों न पत्थर और पॉवर की कड़ी में अगला विचार ‘अलौकिक ताकत’ में मनुष्य के धर्म निर्माण पर हो।

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