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सिंगल यूज प्लास्टिक बैन पर कुछ राज्यों में हो रहा है बेहतर काम, उत्तराखंड को यूपी व हिमाचल से सीखने की जरूरत

देहरादून । पहली जुलाई 2022 से शुरू हुए सिंगल यूज प्लास्टिक बैन अभियान को सफल बनाने के लिए राज्यों को विकल्पों, राज्य एक्शन प्लान, रिसर्च , रीसाइक्लिंग और जन सहभागिता पर व्यापक स्तर पर कार्य करने की ज़रूरत है। देश के कुछ राज्यों में इस दिशा में काम हो रहा है, बाकी राज्यों को भी काम करना होगा। सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के मामले में उत्तर प्रदेश में चलाई गई मुहिम से उत्तराखंड को काफी कुछ सीखने की जरूरत है।

यह बात एसडीसी फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक वर्चुअल कार्यक्रम अंडरस्टेंडिंग द 2022 सिंगल यूज प्लास्टिक बैन में एक्सपर्ट्स की ओर से सामने आई। एसडीसी फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने इस कार्यक्रम में यूएन हेबिटेट इंडिया की वेस्ट मैनेजमेंट स्पेशलिस्ट स्वाति सिंह सांबयाल और जीआईजेड के सीनियर टेक्निकल एडवाइजर गौतम मेहरा से बातचीत की। यह बातचीत एसडीसी फाउंडेशन के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर साझा की गई है।

यूएन हेबिटेट इंडिया की वेस्ट मैनेजमेंट स्पेशलिस्ट स्वाति सिंह सांबयाल का कहना था कि फिलहाल जिन 19 सिंगल यूज प्लास्टिक वस्तुओं पर बैन लगाया गया है, वह कुल सिंगल यूज प्लास्टिक वेस्ट का करीब 25 परसेंट है। कई सारी ऐसी वस्तुएं हैं, जो पॉल्यूशन में बहुत बड़ा रोल अदा करती हैं, उन पर अभी बैन नहीं है।

स्वाति ने कहा की जब हम सिंगल यूज प्लास्टिक बैन की तरफ बढ़ते हैं तो इसके विकल्पों को लेकर काम करने की जरूरत है। इसके लिए रिसर्च, अध्ययन और वर्क प्लान की जरूरत है।

स्वाति के अनुसार कहीं ऐसा न हो कि सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के नाम पर हम कोई ऐसा विकल्प इस्तेमाल करना शुरू कर दें, जो भविष्य में इससे भी बड़ा मुसीबतों को पहाड़ खड़ा कर दे। जो विकल्प हम शुरू करेंगे, उसे कैसे कलेक्ट किया जाएगा और कैसे उसका निस्तारण होगा, इस बारे में भी पहले से वर्क आउट करना जरूरी है। वे सिंगल यूज से मल्टी यूज की तरफ बढ़ने के लिए लोगों को अवेयर करने की बात करती हैं।

स्वाति सांबयाल ये भी कहती हैं कि इस मामले में प्लास्टिक की मोटाई के मानक तय करना ठीक नहीं है। 50 माइक्रोन से कम या 75 माइक्रान से कम जैसे मानक दुविधा पैदा करते हैं, इसलिए प्लास्टिक पन्नी का माइक्रोन तय न करके उसे पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए।

जीआईजेड के सीनियर टेक्निकल एडवाइज गौतम मेहरा के अनुसार सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के लिए कुछ राज्यों में काम शुरू हुआ है। तमिलनाडु में यलो बैग मुहिम शुरू की गई है और बाजारों में बैग एटीएम लगाये जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी कुछ काम शुरू हुआ है। दिल्ली में लोगों का अवेयर किया जा रहा है।

गौतम ने कहा कि उनकी संस्था ने उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार के साथ मिलकर सिंगल यूज प्लास्टिक को लेकर पांच दिन की रेस मुहिम चलाई जो काफी सफल रही। गौतम के अनुसार राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश में नगर निकायों के लिए प्लास्टिक एकत्रित करने की प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता में राज्य के 700 से ज्यादा निकायों ने हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि आम तौर पर इस तरह के अभियानों से शहरी विकास विभाग दूर रहते हैं, वे इसे पर्यावरण विभाग का काम मानते हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश में सभी विभाग इस मामले में एकजुट हो गये हैं।

गौतम कहते हैं कि हमें किसी भी प्रोडक्ट के साथ पैकेजिंग के रूप में कचरा भी मिलता है। सरकार ने नियम बनाकर इस कचरे की जिम्मेदारी उत्पादक पर डाल दी है। लेकिन, यह जरूरी है कि आम लोग इसके लिए जागरूक हों।

गौतम बिस्कुट पैकेट का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि बिस्कुट खाने के बाद उसके पैकेट को हम बाकी कचरे के साथ मिला देते हैं तो यह रिसाइकलर तक नहीं पहुंच पाता। इसके लिए हमें ऐसे कचरे को अलग रखना होगा।

एसडीसी फाउंडेशन के अनूप नौटियाल ने कहा कि अभी बहुत कुछ काम करने की जरूरत है, लेकिन देश एक कदम आगे बढ़ा है। उन्होंने कहा कि जब यूपी में 700 से ज्याद नगर निकाय इस मुहिम में शामिल हो सकते हैं तो उत्तराखंड के 102 निकायों में भी ऐसी मुहिम चलाई जा सकती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि उत्तराखंड में भी कई अन्य राज्यों की तरह इस दिशा में काम शुरू होगा। उन्होंने स्वाति सांबयाल और गौतम मेहरा से उम्मीद की कि उत्तराखंड में इस तरह की मुहिम में उनका सहयोग मिलेगा।

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