देहरादून। उत्तराखंड में ऊर्जा क्षेत्र को नई दिशा देने और विकास की रफ्तार बढ़ाने के उद्देश्य से गठित टीएचडीसी-यूजेवीएनएल का संयुक्त उपक्रम 'ट्यूको' अपने शुरुआती चार वर्षों में धरातल पर पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुआ है। बड़े-बड़े दावों और उम्मीदों के साथ अस्तित्व में आई यह संयुक्त ऊर्जा कंपनी चार साल में चार कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है। इसे सौंपी गई सभी पाँचों प्रमुख परियोजनाएं या तो ठप पड़ चुकी हैं या फिर कागज़ों से बाहर ही नहीं निकल पाईं, जिससे अब इस संयुक्त उपक्रम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
उत्तराखंड में ऊर्जा क्षेत्र को नई रफ्तार देने और जल विद्युत व पंप स्टोरेज परियोजनाओं को तेजी से धरातल पर उतारने के उद्देश्य से बनाया गया टीएचडीसीआईएल-यूजेवीएनएल संयुक्त ऊर्जा कंपनी (ट्यूको) करीब चार साल बाद भी किसी परियोजना को आगे बढ़ाने में सफल नहीं हो पाई है। शुरुआत में कंपनी को पांच महत्वपूर्ण ऊर्जा परियोजनाएं सौंपी गई थीं, लेकिन इनमें से एक भी परियोजना वर्तमान में ट्यूको के स्तर पर निर्माण या क्रियान्वयन की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी। अब छठी परियोजना के रूप में हरिद्वार नगर निगम से जुड़ा प्रस्ताव भी एमओयू के बाद अटकने से संयुक्त उपक्रम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। ट्यूको को मार्च 2023 में मंजूरी दी गई थी और एक दिसंबर 2023 को यह अस्तित्व में आया। संयुक्त उपक्रम में टीएचडीसीआईएल की 74 प्रतिशत और यूजेवीएनएल की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी तय की गई है। इसका उद्देश्य उत्तराखंड में चयनित स्थलों पर जल विद्युत और अन्य ऊर्जा परियोजनाओं की योजना तैयार करने के साथ उनका कार्यान्वयन, संचालन और रखरखाव करना है। कंपनी का कार्यालय देहरादून की ईसी रोड पर स्थापित किया गया है। शुरुआत में ट्यूको को कुल पांच परियोजनाएं दी गई थीं। इनमें तीन जल विद्युत परियोजनाएं और दो पंप स्टोरेज प्लांट शामिल थे। उम्मीद थी कि दोनों ऊर्जा कंपनियों के अनुभव और संसाधनों के संयुक्त इस्तेमाल से परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन अब तक किसी भी परियोजना के धरातल पर न उतरने से इस संयुक्त मॉडल की उपयोगिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शुरुआती परियोजनाओं में 63 मेगावाट की मोरी-हनोल जल विद्युत परियोजना शामिल थी। हालांकि बाद में यह परियोजना ट्यूको से हटाकर यूजेवीएनएल को ही दे दी गई। इसके चलते संयुक्त उपक्रम के पास शुरुआती सूची की एक परियोजना भी नहीं रही। इसी तरह 280 मेगावाट की उर्थिंग सोबला और 146 मेगावाट की बुदियार-सरकारी-भ्योल जल विद्युत परियोजनाएं केंद्रीय स्तर पर मंत्रालय से जुड़े मामलों में उलझ गईं। इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में विभिन्न प्रक्रियात्मक और स्वीकृति संबंधी अड़चनें सामने आईं। ट्यूको को दो पंप स्टोरेज परियोजनाओं की जिम्मेदारी भी दी गई थी। इनमें 600 मेगावाट की पुनगढ़-मटियाला पंप स्टोरेज परियोजना और 630 मेगावाट की जसपालगढ़ पंप स्टोरेज परियोजना शामिल थीं। दोनों परियोजनाएं भी आगे नहीं बढ़ सकीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन परियोजनाओं के व्यावहारिक न होने के कारण इन्हें आगे बढ़ाने की प्रक्रिया ठहर गई। इस तरह शुरुआती पांच परियोजनाओं में से किसी पर भी ट्यूको के स्तर पर ठोस प्रगति नहीं हो सकी। ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और राज्य की जल विद्युत क्षमता का बेहतर उपयोग करने की उम्मीदों के बीच यह स्थिति चर्चा का विषय बन गई है। अब हरिद्वार नगर निगम से जुड़ी एक परियोजना को भी ट्यूको के साथ आगे बढ़ाने की पहल हुई थी। इसके लिए एमओयू भी किया गया, लेकिन इसके बावजूद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इससे संयुक्त उपक्रम के सामने परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की चुनौती और स्पष्ट हो गई है। हालांकि टीएचडीसी के अधिकारियों का कहना है कि नई संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक ऊर्जा क्षेत्र में संभावित परियोजनाओं की तलाश और नए विकल्पों पर विचार जारी है। अब निगाह इस बात पर है कि संयुक्त उपक्रम आने वाले समय में नई परियोजनाओं को कितनी तेजी से मूर्त रूप दे पाता है और राज्य की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के अपने मूल उद्देश्य को किस हद तक पूरा कर पाता है।

