उत्तराखंड में चुनावी बिसात: सीएम धामी को 25 विधानसभा सीटों से मिला चुनाव लड़ने का न्योता! विधायकों का 'रिपोर्ट कार्ड' तय करेगा टिकट

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देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपनी रणनीतिक बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। चुनावी तैयारियों के बीच प्रदेश की सियासत का पारा चढ़ गया है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बढ़ती लोकप्रियता के चलते उन्हें प्रदेश की 25 अलग-अलग विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने के आमंत्रण पत्र मिले हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के मौजूदा विधायकों के लिए अपनी राजनीतिक साख बचाने की परीक्षा शुरू हो गई है।

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। दिल्ली में हुई भाजपा की उत्तराखंड कोर ग्रुप की बैठक के बाद जहां संगठन और चुनावी रणनीति को लेकर मंथन तेज हुआ है, वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगली विधानसभा सीट को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री को प्रदेश की करीब 25 विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने के प्रस्ताव और आमंत्रण मिले हैं। हालांकि, अंतिम फैसला मुख्यमंत्री और भाजपा संगठन को ही करना है। मुख्यमंत्री धामी फिलहाल चंपावत से विधायक हैं और पार्टी के भीतर इस सीट को उनके लिए मजबूत विकल्प माना जा रहा है। वहीं, खटीमा को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। धामी इससे पहले खटीमा विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ऐसे में आगामी चुनाव में चंपावत के साथ खटीमा को लेकर भी राजनीतिक समीकरणों पर मंथन की अटकलें हैं। भाजपा के भीतर चंपावत को मुख्यमंत्री के लिए अपेक्षाकृत पसंदीदा सीट माना जा रहा है। इसके पीछे क्षेत्र में पिछले वर्षों के दौरान हुए विकास कार्यों को प्रमुख वजह बताया जा रहा है। सरकार की ओर से चंपावत में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू की गई हैं और इसे विकास के मॉडल के तौर पर भी प्रस्तुत किया जाता रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री आगामी विधानसभा चुनाव में किस सीट से मैदान में उतरेंगे, इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। पार्टी संगठन और मुख्यमंत्री स्तर पर चुनावी परिस्थितियों, स्थानीय समीकरणों और राजनीतिक संभावनाओं को देखते हुए फैसला लिया जाएगा। दिल्ली में हुई कोर ग्रुप बैठक के बाद भाजपा के मौजूदा विधायकों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक आगामी महीनों में विधायकों की जनता के बीच पकड़, कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की क्षमता पर नजर रखी जाएगी।

यानी फिलहाल मौजूदा विधायकों के टिकट पर कोई सीधा संकट नहीं माना जा रहा, लेकिन उनकी राजनीतिक परीक्षा जरूर शुरू हो गई है। विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने का संकेत दिया गया है। भाजपा के आंतरिक सर्वे में जिन विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी या मौजूदा विधायक अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में बताए जा रहे हैं, वहां भी संगठन की नजर है। हालांकि, इन सीटों पर टिकट कटने की अटकलों को पार्टी के वरिष्ठ नेता जल्दबाजी मान रहे हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि दिल्ली की बैठक का मुख्य उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार करना था। राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी में प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों, संगठनात्मक तैयारियों और चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई। आगामी चुनाव से पहले उत्तराखंड भाजपा संगठन में संभावित बदलाव को लेकर भी चर्चाएं चल रही हैं। प्रदेश अध्यक्ष के चेहरे को लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं, जिन विधानसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक कमजोरी महसूस की गई है, वहां विशेष रणनीति के तहत बदलाव की संभावना पर भी मंथन की बात सामने आ रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि मौजूदा विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में पूरी सक्रियता के साथ जनता और कार्यकर्ताओं के बीच रहना होगा। सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने के साथ स्थानीय समस्याओं के समाधान और संगठन को मजबूत करने पर जोर देना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के लिए जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है और आगामी चुनाव की तैयारियों में जमीनी प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाएगी। मुख्यमंत्री को कई विधानसभा क्षेत्रों से मिले चुनाव लड़ने के निमंत्रण ने प्रदेश की सियासत को जरूर गरमा दिया है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि भाजपा मुख्यमंत्री धामी को एक बार फिर चंपावत से मैदान में उतारती है, खटीमा की ओर रुख करती है या किसी नए विधानसभा क्षेत्र से चुनावी दांव खेलती है फिलहाल पार्टी का फोकस संगठन को मजबूत करने, विधायकों की सक्रियता बढ़ाने और जनता के बीच सरकार की उपलब्धियों को पहुंचाने पर है। आने वाले महीनों में जमीनी फीडबैक और राजनीतिक समीकरण ही यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि कौन विधायक चुनावी मैदान में बरकरार रहता है और किस सीट पर पार्टी नया चेहरा उतारने का फैसला करती है।