उत्तराखंड का सियासी पारा सातवें आसमान पर: एक दिवसीय सत्र के लिए देहरादून में सुरक्षा और राजनीति सख्त

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उत्तराखंड की शांत वादियों में इन दिनों राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। प्रदेश की धामी सरकार द्वारा बुलाए गए एक दिवसीय विशेष सत्र ने राज्य की सियासत में 'तूफान' खड़ा कर दिया है। सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच 'आर-पार' की जंग छिड़ गई है। जहाँ सरकार महिला आरक्षण के संशोधित बिल के बहाने विपक्ष को चारों खाने चित करने की रणनीति बना रही है, वहीं कांग्रेस ने भी सड़क से लेकर सदन तक सरकार को घेरने के लिए 'प्लान-बी' तैयार कर लिया है।

विशेष सत्र का एजेंडा भले ही महिला आरक्षण के इर्द-गिर्द घूम रहा हो, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उस संभावित 'निंदा प्रस्ताव' की है, जिसे सरकार सदन के पटल पर ला सकती है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि केंद्र सरकार के 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के संशोधित स्वरूप को संसद में पारित कराने के दौरान कांग्रेस के रुख को आधार बनाकर भाजपा यहाँ निंदा प्रस्ताव पेश कर सकती है। भाजपा का सीधा आरोप है कि कांग्रेस ने संसद में बिल का विरोध कर अपना 'महिला विरोधी' चेहरा उजागर कर दिया है। भाजपा विधायक दुर्गेश्वर लाल ने दो टूक कहा है कि कांग्रेस की नीयत कभी साफ नहीं रही और आने वाले समय में प्रदेश की मातृशक्ति इसका करारा जवाब देगी। विपक्ष को इस घेराबंदी का आभास पहले ही हो चुका है। यही कारण है कि कांग्रेस ने 'डिफेंस' के बजाय 'अटैक' की मुद्रा अपना ली है। कांग्रेस के दिग्गज नेता और विधायक प्रीतम सिंह ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में महिलाओं के हितों के प्रति गंभीर होती, तो वह केवल राजनीतिक लाभ के लिए विशेष सत्र नहीं बुलाती। प्रीतम सिंह ने मांग की है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में ही महिलाओं को 70 सीटों पर आरक्षण का लाभ मिले। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा केवल हेडलाइंस बटोरने के लिए विशेष सत्र का ढोंग कर रही है, जबकि धरातल पर महिलाओं के लिए कोई ठोस काम नहीं हुआ है। विशेष सत्र की आहट के साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राजधानी देहरादून की सड़कों पर मोर्चा खोल दिया है। महिला अपराधों, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस सरकार को घेर रही है। पार्टी की रणनीति स्पष्ट है सदन के भीतर यदि निंदा प्रस्ताव के जरिए उन्हें दबाने की कोशिश हुई, तो वे सरकार की नाकामियों का कच्चा चिट्ठा खोल देंगे। कांग्रेस आलाकमान ने अपने सभी विधायकों को एकजुट रहने और सरकार के हर वार का 'मुंहतोड़ जवाब' देने के निर्देश जारी किए हैं। धामी सरकार के लिए यह सत्र काफी महत्वपूर्ण है। महिला आरक्षण बिल के संशोधित स्वरूप को सदन से पारित कराकर भाजपा खुद को 'महिला हितैषी' साबित करना चाहती है। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ चुनाव परिणामों में महिला वोटरों की भूमिका निर्णायक होती है, वहां कोई भी दल खुद पर 'महिला विरोधी' का ठप्पा नहीं लगने देना चाहता। यही वजह है कि यह विशेष सत्र केवल विधायी कार्य तक सीमित न रहकर एक बड़े राजनीतिक अखाड़े में तब्दील होता दिख रहा है। उत्तराखंड की राजनीति के लिए यह विशेष सत्र मील का पत्थर साबित हो सकता है। जहाँ भाजपा इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश करेगी, वहीं कांग्रेस इसे सरकार की 'विफलता' बताने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। अब देखना यह होगा कि सदन के भीतर होने वाला यह 'संग्राम' उत्तराखंड की जनता और खासकर मातृशक्ति को कितना संतुष्ट कर पाता है।